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गुरुवार, जनवरी 1

मैं तो एक ख्वाब हूं (सिने मैजिक)

गुजराती लेखक - अजित पोपट 

हिन्दी अनुवादक - कुमार अहमदाबादी 

ता.11-02-2011 के दिन गुजरात समाचार की कॉलम सिने मैजिक 


(लेखक - अजित पोपट) के एक दो पैरेग्राफ का आंशिक अनुवाद )


सेवा करने के उद्देश्य से गांव में बसे डॉक्टर और लगभग निरक्षर जैसी एक युवती जो एक बागी की पुत्री है; यूं तो इन दोनों में छत्तीस का आंकड़ा होना चाहिए। लेकिन कभी कभी एसी परिस्थिति में दिल के तार जुड़ जाते हैं। लेकिन एसे संबंध में जब हताशा निराशा प्रवेश करती है।‌ तब मन के भाव को एसे शब्द “शाख से टूट के गुंचे भी कहीं खिलते हैं, रात और दिन जमाने में कहीं मिलते हैं, भूल जा जाने दे तकदीर से तकरार व कर, मैं तो एक ख्वाब हूं, उस ख्वाब से तू प्यार न कर” बहुत असरदार तरीके से व्यक्त करते हैं। कमर जलालाबादी के लिखे गीत को संगीत निर्देशक कल्याण‌ जी आनंद जी ने राग तोडी के स्वरों में एवं छह मात्रा के दादरा ताल में स्वरबद्ध किया है। जिसे मुकेश ने बहुत ही गमगीन आवाज़ में गाया है।‌ राग तोडी की बात निकली है तो इसी राग में बने एक और यादगार गीत को याद कर लें। डाकू रानी पूतली बाई के अत्याचार से त्रस्त गांववालों की वेदना एवं डाकूओं को सलाह देने के एक गायक गीत गाता है। गीत के शब्द “निर्धन का धन लूटने वालो लूट लो दिल का प्यार, प्यार वो धन है जिस के आगे सब धन है बेकार, इन्सान बनो, कर लो भलाई का कोई काम, दुनिया से चले जाओगे कर जाएगा बस नाम, इन्सान बनो….” है । ये गीत भी राग तोडी पर आधारित था। 



स्वप्न को हम वास्तविकता यूं बनाते हैं (गीत)


स्वप्न को हम वास्तविकता यूँ बनाते हैं,

नर्मदा का नीर साबर में बहाते हैं.               

                                  स्वप्न को….


हो सुलगती रेत या फिर बर्फ या पानी,

संकटो में पांव हिम्मत से बढ़ाते हैं.

लक्ष्य ऊँचे प्राप्त करने है कहाँ आसान,

गुरुशिखर तक ठोकरें खाकर भी जाते हैं,   

स्वप्न को….


अमरीका या अफरीका या पूर्व या पच्छम,

दूध में चीनी से हम घुलमील जाते हैं,

खींच लाया इस जमीं का जादू कान्हा को,

जो यहाँ पर द्वारिका नगरी बसाते हैं,          

स्वप्न को….


भूमि ये वनराज की, सरदार, गाँधी की,

राष्ट्र का जो नव-सृजन कर के दिखाते हैं,

शून्य, प्रेमानंद, अखो, नरसिंह, कलापी से,

काव्य-धारा भिन्न छंदों में बहाते हैं,             

स्वप्न को…


गुर्जरों के हौसले को दाद देता जग,

आम-जन भी खेल ऊँचा खेल जाते हैं,

खून की होली जो खेले उन से ये कह दो,

हम दशानन को दशहरे पर जलाते हैं,       

स्वप्न को….



वनराज चावड़ा सदियों पहले हुआ एक गुजराती विजेता योद्धा है. जिसे गुजरात का पहला विजेता माना जाता है। इस के अलावा गुजरात के सासण गिर के बब्बर शेर भी विख्यात है। एशिया में शेरों की आबादी अब सिर्फ सासण गिर के वन में ही बची है। गुजरात में बब्बर शेरों को वनराज यानि वनों का राजा

 कहा जाता है। 

कुमार अहमदाबादी 

वृद्धों में स्मृति भ्रंश

डिजिटल लाइफस्टाइल में वृद्ध स्मृति भ्रंश का शिकार हो रहे हैं

अनूदित 

अनुवादक - कुमार अहमदाबादी 

डिजिटल लाइफस्टाइल में वृद्ध 

स्मृति भ्रंश का शिकार हो रहे हैं

डिजिटल क्रांति के कारण लोग लगातार नयी टेक्नोलॉजी और नये उपकरणों का उपयोग करने लगे हैं। बच्चों से लेकर बूढों एवं अमीर से लेकर गरीब तक के प्रत्येक वर्ग के वृद्ध स्मार्टफोन स्मार्ट गैजेट्स और नयी साधनो का उपयोग करने लगे हैं; बल्कि ये आदत बन चुके हैं। अब परिस्थिति ये है। जिस कार्य के लिये मस्तिष्क का उपयोग करते थे। उस के लिये अब स्मार्टफोन और गैजेट्स का उपयोग किया जा रहा है। इस के कारण समस्याएं उत्पन्न हुई हैं। एक रिपोर्ट आया है। उस रिपोर्ट के अनुसार डिजिटल साधनों के अति उपयोग के कारण वृद्धों में स्मृति भ्रंश की घटनाएं बढ़ रही है। 

संशोधक बताते हैं। प्रत्येक वर्ष करोड़ों लोग किसी कार्यवश अपने घर से निकलने के बाद अन्य किसी स्थान पर पहुंच जाते हैं। एसा याद शक्ति कमजोर होने के या गंवाने के कारण होता है। एसे वृद्धों के रास्ते में एक्सीडेंट होने की घटनाएं भी हुई है।‌ वर्तमान में इस समस्या का सामना सब से ज्यादा जापानी लोग कर रहे हैं।संशोधकों ने कुछ समय पहले बताया था। ये समस्या भविष्य में भारत में भी अपने पैर पसारने वाली है। संशोधकों ने कुछ समय पहले बताया था।  

गुजरात समाचार में छपे लेख का अनुवाद

मंगलवार, दिसंबर 30

सुनो क्या ये धुरंधर बोलते हैं (ग़ज़ल)

सुनो क्या ये धुरंधर बोलते हैं

कहानी क्या है मंजर बोलते हैं 


वहां सब मौन हो जाते हैं प्यारे

जहां खामोश खंजर बोलते हैं


मिलेंगे सीप मोती खोजने पर

हमें अक्सर समंदर बोलते हैं


न जाने क्यों एवं कब से प्रजा की

जुबां खामोश है डर बोलते हैं


यहां कुछ भी न तेरा है न मेरा 

गृहस्थी को कलंदर बोलते हैं 


वो बरमूडा है मत जाओ वहां तुम

जहाजों से समंदर बोलते हैं 


किया क्या है कुमार जीवन में तुमने 

मुझे वक्ती सिकंदर बोलते हैं 

शनिवार, दिसंबर 27

मुस्कुरा रही है कब से (रुबाई)


 मन ही मन मुस्कुरा रही है कब से 
आंखें भी पट पटा रही है कब से 
मौसम का है नशा या है यौवन का
मछली सी छटपटा रही है कब से 
कुमार अहमदाबादी 

गुरुवार, दिसंबर 25

अखे के छप्पे का भावार्थ


अनुवादक - कुमार अहमदाबादी


ओछुं पात्र ने अदकुं भण्यो, वढकणी वहु ए दीकरो जण्यो

मारकणो सांढ चोमासुं माल्यो, करडकणो कूतरो हडकवा हाल्यो

मरकट ने वळी मदिरा पीवे, अखा एथी सौ कोई बीवे

अखो


ओछुं भण्यो यानि अल्प योग्यता वाला इंसान एवं अधूरा ज्ञान रखने वाला इंसान समाज के लिये उतना ही हानिकारक होता है। जितना हानिकारक झगड़ालू बहु का पुत्र परिवार के लिये होता है। जिस तरह एक हिंसक बैल बरसात के मौसम में खुला छोड़ दें तो वो विनाशकारी साबित होता है।‌ जिस तरह कुत्ता पागल होने पर किसी को भी काट सकने के कारण सब उस से बच के रहते हैं। उसी तरह पागल सनकी इंसान के हर व्यक्ति बच के रहता है; उस से दूर ही रहता है। पागल सनकी इंसान की सनक जितनी ज्यादा होती है। वो उतना ही खतरनाक होता है। बंदर वैसे भी बहुत चंचल व शरारती होते हैं। कई बार यूं ही उल्टी सीधी शरारतें करते हैं। एसे में अगर कोई बंदर मदिरा पी ले; फिर तो कहना ही क्या! फिर तो वो जितना तूफान मचाए वो कम होता है। इंसान को वो खानपान कतई नहीं करना चाहिए। जो इस के भीतर की विध्वंसक शक्तियों को जागृत कर दे। कम योग्यता या बिना योग्यता वाले इंसान के पास शक्तियों का होना। समाज के लिये हमेशा घातक साबित होता है। शक्तियां सकारात्मक इंसान के पास हो तो समाज व इंसान के प्रगति का और नकारात्मक इंसान के पास हो तो अधोगति का निमित्त बनती है।

शुक्रवार, दिसंबर 19

सब पीते हैं कहती है(रुबाई)


 सब पीते हैं कहती है मधुशाला 

सारे होते हैं तृप्त पीकर प्याला

हां, होता है समय अलग मक़सद भी

करती है शांत हर अगन को हाला

कुमार अहमदाबादी 



मैं तो एक ख्वाब हूं (सिने मैजिक)

गुजराती लेखक - अजित पोपट  हिन्दी अनुवादक - कुमार अहमदाबादी  ता.11-02-2011 के दिन गुजरात समाचार की कॉलम सिने मैजिक  (लेखक - अजित पोपट) के एक ...